The Real Life Story | माँ की ममता

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बचपन से ही सुधा एम्बिशयस लड़की रही  है  जब भी कोई पड़ोसन,रिश्तेदार यह कहते कि कुछ कुकिंग सीख लो तो वह तुनककर मना कर देती थी.
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सब उसे समझाते कि एक लड़की चाहे जज बन जाये या कलेक्टर,भारतीय समाज में वो अपने आप को इन कामों से बचा नहीं सकती. इस पर वो कहती थी कि सब लड़कियों की तरह मैं गोल गोल रोटियां बनाने में ज़िन्दगी पूरी नहीं करुँगी. और हुआ भी यही.

उसने खूब पढाई की और उसकी अच्छे पैकेज पर नौकरी लग गयी. यह उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी और उसे क्या चाहिए था उसे लगता था कि उसके घर की बड़ी उम्र की लेडीज ने सारी ज़िन्दगी चूल्हे चौके में ही गँवा  दी. चलो मैं तो समझदार निकली. हर चीज़ ही तो उपलब्ध है बाज़ार में. महंगे से महंगे खाने की चीज़ें,पहनने ओढ़ने की सब चीज़े ही तो मिल जाती है. सब मस्ती से बीत रहा था तभी मालविका नाम की लड़की ने ऑफिस ज्वाइन किया, पढ़ी लिखी,समझदार,स्मार्ट,एक्टिव,हर काम में परफेक्ट लड़की. सब स्वादिष्ट व्यंजनों की रेसिपीस उसके टिप्स पर थी. पाक कला  में कुशल. ऑफिस में जैसे ही टिफ़िन खुलते,उसकी रेसिपीस को हर कोई सराहता. सुधा को भीतर ही भीतर हीन भावना होती कि उसे यह सब क्यों नहीं आता? खैर कुछ समय बाद सुधा ने शादी कर ली. घर की हर पार्टी के लिए कुक थी, और बाहर की पार्टीज के लिए होटल. सब ठीक चल रहा था. इसी बीच वह प्यारे से बच्चे ‘संयम’ की माँ बन गयी. बच्चा स्कूल पढ़ने लगा.  अब बारी आयी संयम का टिफ़िन पैक करने की. जो उसकी आया पैककर देती थी. खाना बहुत स्वाद होता था इसलिए उसके टिफ़िन का खाना सभी बच्चे पसंद करते थे. पर उसके दोस्तों के टिफ़िन उनकी मायें तैयार करती थी इसलिए उसे वो खाना सादा होने के बावजूद भी ज्यादा अच्छा लगा करता था. सब बच्चे कहते यह तो  मेरी माँ ने बनाया है पर संयम  क्या कहता? वह उदास रहने लगा. सुधा ने उससे पूछा तो उसने सारी बात बताई और रोने लगा. सुधा अपने बचपन की पुरानी यादों में खो गयी,जब उसे सब कहा करते थे कि तुम तो अपने ससुराल वालों को भूखा रखोगी,तो वह कहा करती थी कि मैं सब बाजार से खरीद लूंगी. पर माँ की ममता तो बाज़ार से खरीदी नहीं जा सकती. उसने इंटरनेट पर रेसिपीज सर्च  की, और उन्हें ट्राई करने लगी. शुरू में तो उससे रोटी भी गोल नहीं बनती थी पर धीरे धीरे वह सब सीखती  गयी. मायके गयी तो मां बीमार थी, उन्हें अपने हाथो से व्यंजन बना कर खिलाये. उसने माँ से कहा चाहे मैं कितना भी स्वाद खाना क्यों न बनाऊ वह उतना लज़ीज़ नहीं होता जितना आपके हाथो से बना खाना होता है. माँ ने उसे कुकिंग के कुछ टिप्स दिए और कहा कि ‘इंटरनेट अम्मा’ वह सब नहीं सिखा सकती जो आपकी अपनी माँ सिखा सकती है. सब हंसने लगे.पर सुधा की आँखों में आंसू आ गए यह सोचकर कि जिन्हे मैं मामूली कामों में ज़िन्दगी बर्बाद करने वाली,अनपढ़,बेरोजगार औरते मान कर उन्हें बेवकूफ समझकर अपने आप को महान समझ रहीथी, उन्होंने ही मातृत्व की ममता से पाल पोस कर मेरे अंदर संस्कार भरें हैं.उन बातों को, जो मेरे परिवार के बड़े नहीं समझा सके, उसे मेरे बेटे संयम ने समझा दिया कि माँ के हाथों से बने खाने में जो रस और स्वाद होता है वह महंगे स्वादिष्ट व्यंजनों में भी नहीं  होता.

माँ का प्यार -दुलार, उसकी ममता की छाँव में सीखी रेसिपीज इंटरनेट से सीखी रेसिपीस से कहीं ज़्यादा लज़ीज़ होती है. माँ ने सुधा की भावनाओं को समझ कर उसका माथा चूम लिया. तभी सुधा का बेटा दौड़ता दौड़ता गोद में आकर सुधा के हाथों से खाना खाने की ज़िद करने लगा. सुधा ने संयम कोअपने गले से लगा लिया, आज वह अपने पढ़े लिखे और बड़े पद पर आसीन होने के अहंकार से मुक्त स्वयं को एक सम्पूर्ण माँ के रूप में अनुभव कर रही थी. उसे लगा कि उसने कितने अनमोल क्षण खो दिए, जब वो माँ से कुकिंग सीख सकती थी,और उन्हें वो नयी नयी रेसिपीस बनाकर खिला सकती थी और आज के व्यस्त जीवन क्रम में ऐसा कर पाना रोज़ तो संभव नहीं था. खैर उसने जो किया, वो उसकी लाइफ है,पर आप जो करेंगी वो आपकी लाइफ होगी.

मेरी ‘आजकल की मॉडर्न’ लड़कियों से विनती है कि जीवन में जो अच्छी सीख आपको आपके पेरेंट्स दे रहें हैं,उसे आज ही अपना लीजिये, नहीं तो हो   सकता है कि संयम जैसी संताने या मालविका जैसी कुलीग्स आपको इन्फेरीयोरिटी काम्प्लेक्स दे दें.या आपको बचपन के उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर दें जहाँ से कुछ बातें सीखना भारतीय परिप्रेक्ष्य में आपके लिए अनिवार्य हो.चाहे वो सामाजिक व्यवस्था के कारण  या अपनी भावुकता के कारण. अपने वेल विशर्स को नज़रअंदाज़ मत कीजिये. ऑल  दी बेस्ट, जीवन में खुशिया बटोरिये, आनंद मनाईये. हमारी शुभ कामनाये आपके साथ हैं.

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