निःसंतानता : प्रक्रिया, लागत, साइड इफेक्ट्स , पूरी जानकारी | Infertility: Process, Cost, Side Effects, Complete Information

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निःसंतानता : प्रक्रिया, लागत, साइड इफेक्ट्स , पूरी जानकारी |
निःसंतानता : प्रक्रिया, लागत, साइड इफेक्ट्स , पूरी जानकारी |

इनफर्टिलिटी

वर्तमान समय की चेंज होती लाइफ स्टाइल में ज्यादातर महिलाएं कामकाजी हैं। साथ ही करियर कॉन्शियस गल्र्स में भी प्रोफेशनेलिज्म का क्रेज बढ़ रहा है। इसी वजह से शादी की उम्र सीमा भी बढ़ गई है। व्यस्तम जीवनशैली और छोटे परिवार का चलन भी कुछ कम नहीं है। इन दिनों शादी की उम्र सीमा बढऩे के साथ ही शहर के नव दंपत्ति प्रोफेशनल लाइफ में खलल न पड़े इसलिए डबल इनकम, नो किड्स फार्मूला अपना रहे हैं। अब शादी की उम्र २२ से २५ न होकर, ३० से ३५ हो गई है। ऐसे में प्रेगनेंसी की एज भी बढ़ गई है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि अब दंपत्ति अपने भावी जीवन को लेकर काफी सोचते हैं। वे चाहते हैं कि वे अपने आने वाले बच्चे को हर खुशी दे सकें, उसे उच्च जीवन स्तर प्रदान करें। इसलिए काम के पीछे भागते रहते हैं। इन सब सुविधाओं को जुटाने में शादी के बाद लगभग ५ साल का समय बीत जाता है और अब उन्हें बच्चे की कमी खलने लगती है। लेकिन तब तक महिला की उम्र ४० के आसपास पहुंच जाती है। मातृत्व के लिए महिला की उम्र ४० के पार पहुंचने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे पति की एक्सीडेंटल डेथ, क्रोनिक इलनेस, आनुवंशिक बीमारी या इकलौते बच्चे की किशोरवय में मृत्यु हो जाती है। तब भी दंपत्ति दूसरा बच्चा चाहते हैं। इसके अलावा कई दंपत्ति ऐसे भी हैं जिन्हें रेयर जेनेटिक क्रोमोजोमल एबनॉर्मलिटीज होती हैं। साथ ही जिन माताओं की बच्चादानी निकल चुकी है अथवा जिनके पति नहीं रहे वे भी ४० पार मातृत्व सुख पा सकती हैं। इसके लिए उन्हें कृत्रिम गर्भाधान तकनीक अपनानी होगी।

क्या है आईवीएफ
आईवीएफ या कृत्रिम गर्भाधान तकनीक की सहायता से किसी भी उम्र में संतान प्राप्त की जा सकती है। इस तकनीक में शुक्राणु और अंडाणुओं की सहायता से बॉडी के बाहर भ्रूण तैयार किया जाता है। इस भू्रण को महिला की कोख में प्रत्यारोपित किया जाता है और बच्चा गर्भ में आकार लेने लगता है। अब तक इस तकनीक का लाभ कई महिलाएं ले चुकी हैं।
कब कर सकते हैं आईवीएफ का उपयोग
इस तकनीक का उपयोग ४० की उम्र पार कर चुकी वे महिलाएं, जिनमें एफएसएच (फोलिकल स्टीमुलेटिंग हार्मोन) का लेवल बढऩे लगता है। यह तब बढ़ता है जब स्त्रियां मेनोपॉज की ओर बढ़ती हैं। यानी एक उम्र के बाद उनमें फीमेल हार्माेन कम होने लगते हैं। इस स्थिति में हार्मोंस और इंजेक्शन के द्वारा अंडाशय में अंडों का विकास कराया जाता है।

प्रीमेच्योर ओवेरियन फेलियर
जिन महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब बंद हो जाती है अथवा जिन मांओं में अंडाणु बनना संभव नहीं हो पाता । वे किसी स्वथ्य महिला के डोनर अंडाणु लेकर भी कृत्रिम गर्भाधान कर सकती हैं।
यदि किसी महिला की बच्चेदानी न हो या उसमें कोई गंभीर बीमारी हो गई, जिस वजह से वह गर्भधारण न कर पा रही हो तो ऐसी स्थिति में पति के शुक्राणु और उसी महिला के अंडाणु लेकर भू्रण तैयार किया जा सकता है। इसके बाद इस भू्रण को किराए की कोख में प्रत्यारोपित कर संतान प्राप्त की जा सकती है।

यदि किसी के शरीर में बच्चेदानी तो है लेकिन अंडाशय नहीं है तो ऐसी स्थिति में अन्य डोनर की सहायता से संतान प्राप्त की जा सकती है।
देर से मातृत्व सुख मिलने का कारण:
मिड लाइफ क्राइसिंग यानी अब दंपत्ति के पास सब कुछ है,अगर कोई कमी है तो वह है बच्चे की। जिसके लिए काफी देर हो चुकी है। इसके अलावा इस उम्र में पुरूषों में भी स्पर्म काउंट कम हो जाता है। यह कम होता है यंग ऐज में हायपरटेंशन डायबिटीज होन से, एल्कोहल से, स्मोकिंग से, स्ट्रेस से और पॉल्युशन से। साथ ही पति के बहुत ज्यादा टूर पर रहने से भी यह समस्या हो सकती है, क्योंकि जिस समय स्त्री में अंडाणु बनते हैं संभव है उस समय पति टूर पर हो इसलिए महिला कंसीव नहीं कर पा रही हो। क्या करें सही समय पर विशेषज्ञ से काउंसिलिंग कराएं। साथ ही जब संतान प्राप्ति की इच्छा है तो इंफर्टिलिटी विशेषज्ञ से जांच कराकर देखें कि क्या-क्या विकल्प मौजूद हैं। शादी के बाद एक-दूसरे की भावनाओं को समझें। डॉक्टर से खुलकर बात करें और विश्वास रखें। इस तकनीक का यूज काफी बढ़ गया है इसलिए कानूनी पक्ष भी जान लें।

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