Narak Chaturdashi Roop Chaudas Katha Mahatav Vidhi Lok Manyatayein | Roop Chaudas Vrat Yam Deep Daan 2020

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    नरक चतुर्दशी रूप चौदस कथा महत्तव विधि | नर्क चतुर्दशी (रूप चौदस) की कथा और महत्व  | Narak Chaturdashi Roop Chaudas Katha Mahatav Vidhi |  कथा व लोकमान्यताएं

    जीवन के अँधेरे दूर भगाए: नरक चतुर्दशी

    नरक चतुर्दशी का त्योहार (Narak Chaturdashi Roop Chaudas Katha Mahatav Vidhi Lok Manyatayein )  हर साल कार्तिक कृष्ण चतुदर्शी को यानी दीपावली के एक दिन पहले मनाया जाता है। इस चतुर्दशी तिथि को छोटी दीपावाली के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन प्रात: काल स्नान करके यम तर्पण एवं शाम के समय दीप दान का बड़ा महत्व है।

    क्या है इतिहास:
    पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अत: आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। नरकासुर का वध और 16 हजार कन्याओं के बंधन मुक्त होने के उपलक्ष्य में नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान की परंपरा शुरू हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन सुबह स्नान करके यमराज की पूजा और संध्या के समय दीप दान करने से नर्क के यतनाओं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। इस कारण भी नरक चतु्र्दशी के दिन दीपदान और पूजा का विधान है।

    रोचक तथ्य:
    दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्यायोचित नहीं होगा। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है।

    जल्दी नहाने की प्रथा:
    छोटी दिवाली यानि नरक चतुर्दशी के दिन जल्दी नहाने की प्रथा है।
    पापों से मुक्ति: मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन विधि.विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

    दीपदान की प्रथा:
    इसी दिन शाम को दीपदान की प्रथा है, जिसे यमराज के लिए किया जाता है।
    श्रृंखला के मध्य में –
    इस पर्व का जो महत्व है, उस दृष्टि से भी यह काफ ी महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार है।
    नरक चतुर्दशी: 
    दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फि र नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली मनाई जाती है।
    क्यों कहते हैं छोटी दीपावली::: इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को।

    कथा व लोकमान्यताएं:: 
    इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में (Narak Chaturdashi Roop Chaudas)कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दांत असुर नरकासुर का वध किया था।

    सोलह हजार एक सौ कन्याओं की मुक्ति:::
    इसी दिन सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया गया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है।

    अन्य कथा: 
    इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक दूसरी कथा यह है कि रंति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोलेए मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फि र आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था यह उसी पापकर्म का फ ल है।इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋ षियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब ऋ षि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋ षियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

    नरक चतुर्दशी का महत्व: 
    इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए।

    सौन्दर्य की प्राप्ति:
    इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फि र उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है।

    बुरी शक्तियां घर से बाहर:
    घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

    रूपचौदस क्यों मनाई जाती है: 
    दीपोत्सव का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी अथवा रूपचौदस होता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व शरीर पर तेल लगाकर स्नान करना चाहिए।

    दक्षिण मुख करके यमराज से प्रार्थना:
    सूर्योदय के पश्चात स्नान करने वाले के वर्षभर के शुभ कार्य नष्ट हो जाते हैं। स्नान के पश्चात दक्षिण मुख करके यमराज से प्रार्थना करने पर व्यक्ति के वर्ष भर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

    देवताओं का पूजन::
    इस दिन सायंकाल देवताओं का पूजन करके घरए बाहरए सड़क आदि प्रत्येक स्थान पर दीपक जलाकर रखना चाहिए।

    रात्रि को जागरण:
    पांच दिवसीय इस पर्व का प्रमुख पर्व लक्ष्मी पूजन अथवा दीपावली होता है। इस दिन रात्रि को जागरण करके धन की देवी लक्ष्मी माता का पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए।

    लक्ष्मी का वास:
    घर के प्रत्येक स्थान को स्वच्छ करके वहां दीपक लगाना चाहिए जिससे घर में लक्ष्मी का वास एवं दरिद्रता का नाश होता है।

    आभूषण आदि का पूजन::
    इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश तथा द्रव्य, आभूषण आदि का पूजन करके 13 अथवा 26 दीपकों के मध्य एक तेल का दीपक रखकर उसकी चारों बातियों को प्रज्वलित करना चाहिए एवं दीपमालिका का पूजन करके उन दीपों को घर में प्रत्येक स्थान पर रखें एवं चार बातियों वाला दीपक रातभर जलता रहे ऐसा प्रयास करें।

    क्यों नहाते हैं जल्दी:

    जैसा कि अभी तक प्रकाश डाला गया कि नरक चतुर्दशी के दिन हम अपनी सारी बुराइयां दूर करते हैं इसलिए हमें जल्दी स्नान करके बुराइयों को दूर भगाना चाहिए।

    इस दिन यह अवश्य करें::

    नरक चतुर्दशी के दिन घर की सफ ाई अवश्य करें। जैसा कि नाम से ही समझ आता है हम अपने घर से सारी बुरी वस्तुओं को बाहर निकाल देते हैं तथा उसके बाद स्नान करके दिवाली के लिए तैयार हो जाते हैं।

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