कामिनी जिन्दल बेस्ट बिजनेस वुमैन

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    श्री कामिनी जिन्दल विकास डब्ल्यू.एस.पी.लि. उद्योग विहार, श्रीगंगानगर के प्रबन्ध निदेशक श्री बी.डी.अग्रवाल की सुपुत्री हैं, जो वर्तमान में भारत की राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) नई दिल्ली में अध्ययनरत हैं। सुश्री जिन्दल समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर कर शोध कर रही हैं। कामिनी जिन्दल का सपना है कि विकास डब्ल्यू.एस.पी.लि. कम्पनी का नाम विश्वस्तरीय ‘फोर्चून-500Ó में दर्ज हो और वह ‘बेस्ट बिजनेस वुमैनÓ की तरह काम करें।
    विकास डब्ल्यू.एस.पी.लि. बीकानेर संभाग की एकमात्र शत प्रतिशत निर्यातक इकाई है जो ग्वार गम पोलीमर्स तथा इसके डेरीवेटिव्स का निर्माण कर दुनिया के 35 से अधिक देशों में निर्यात करती है। इस कम्पनी के प्रवर्तक व प्रबन्ध निदेशक श्री बी.डी. अग्रवाल हैं जिन्होंने इस कम्पनी की स्थापना वर्ष 1988 में की थी। कम्पनी की वार्षिक बिक्री लगभग रू. 550 करोड़ है। विश्वव्यापी बढती मांग की वजह से कम्पनी का कारोबार अगले 5 वर्षो में लगभग तीन गुणा हो जाएगा। कम्पनी द्वारा निर्मित ग्वार गम पोलीमर्स का उपयोग डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थों बेकरी, जैम, जैली, आईसक्रीम, डेयरी उद्योग (सभी प्रकार के अम्लीय दूध उत्पाद), डिब्बाबंद मांसाहार तथा सभी प्रकार के फलों के रस (ज्यूस) में रेशों (फाइबर) को बढ़ाने तथा डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों को अधिक टिकाऊ बनाने के काम में लिया जाता है। ग्वार गम प्राकृतिक पदार्थ है जिसका अपना कोई स्वाद नहीं और यह गंध व उर्जा रहित होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के संस्थानों जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन व खाद्य एवं कृषि संगठन तथा अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन स्नष्ठ्र ने खाद्य पदार्थो में ग्वार गम के उपयोग को मनुष्य के लिए नियमन 121.104 के तहत पूर्णत: सुरक्षित पाया है इसलिए ग्वार गम की कानूनन अनुमति खाद्य पदार्थो के निर्माण करने में इस्तेमाल के लिए दी है। आज संसार में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों में ग्वार गम का अधिकाधिक उपयोग होने लगा है तथा इससे सस्ता इसका कोई विकल्प नहीं है। खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त ग्वार गम के दूसरे बहुत ही महत्वपूर्ण औद्योगिक उपयोग हैं। मुख्यत: सोने व चांदी का खनन उद्योग, जमीन से तेल व प्राकृतिक गैस निकालना, कपड़े व गलीचों की छपाई तथा फार्मास्यूटिकल (दवाईयाँ) आदि। इसीलिए आने वाले समय में ग्वार गम की विश्वव्यापी मांग और तेजी से बढ़ेगी। भविष्य में ग्वार गम की विश्वव्यापी बढ़ती मांग की वजह से भारत के किसानों को बहुत लाभ होगा क्योंकि विश्व के लगभग 85 से 90 प्रतिशत ग्वार की पैदावार भारत में होती है।

    बढ़ती हुई मांग की वजह से वर्ष 2010 में ग्वार का उत्पादन जो लगभग 12 से 14 लाख टन था, होने के बावजूद ग्वार के भावों में इस साल जबरदस्त तेजी आई। इस समय ग्वार गम की निर्यात मांग लगभग 3 लाख टन तथा देशी मांग लगभग 70 से 75 हजार टन तक पहुंंच चुकी है जिसका निर्माण करने के लिए इस उद्योग को लगभग 13 लाख टन ग्वार की आवश्यकता है। विश्वव्यापी मांग में निरन्तर बढ़ोत्तरी की वजह से राजस्थान के किसानों को लाभ मिलना निश्चित है।
    कम्पनी की चारों इकाईयां 18.5 एकड़ भूमि पर स्थित हैं जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 60000 टन ग्वार गम की है। इन इकाईयों में लगभग 500 कर्मचारी काम करते हैं जो आसपास के गांवों से आते हैं। सभी कर्मचारियों को पी.एफ., बोनस, ग्रेच्यूटी, अनिवार्य रूप से साप्ताहिक अवकाश, मेडिकल, रहने व खाने की सुविधाओं के साथ कम्पनी ने सभी कर्मचारियों की जीवन बीमा पॉलिसियां भी करवा रखी हैं जिनके प्रीमियम का आधा भुगतान कम्पनी स्वयं करती है। बीकानेर संभाग में यह कम्पनी बिजली की सबसे बड़ी उपभोक्ता है। कम्पनी बीकानेर में भी ग्वार गम इकाई स्थापित कर रही है जो वर्ष 2012 में उत्पादन शुरू कर देगी। कामिनी जिन्दल ने अपने शोध में भारतीय किसानों की माली हालत का आकलन कर इन्हें न्याय दिलाने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एक पी.आई.एल. रिट याचिका लगाई है। इस रिट याचिका में मांग की गई है कि विश्व व्यापार संगठन में भारत सरकार द्वारा वर्ष 1994 में निष्पादित ए.ओ.ए. के अनुसार भारतीय किसानों को कृषि जिन्सों के भाव दिए जाएं। शोध के अनुसार भारत सरकार द्वारा घोषित कृषि जिन्सों के वर्तमान न्यूनतम समर्थन मूल्य ए.ओ.ए. के मूल्यों से काफी कम है। रिट में वर्ष 1994 से लेकर 2007 तक गन्ने के किसानों को छोड़कर अन्य जिन्सों के किसानों को घोषित समर्थन मूल्य नही दिए जाने की क्षतिपूर्ति की अन्तर रकम रू. 587529.63 करोड़ किसानों का अदायगी क्लेम बनता है।
    यदि किसानों का वर्तमान कर्ज रू. 374896 करोड़ का भुगतान भी सरकार द्वारा कर दिया जाए तो भी लगभग रु. 212633.63 करोड़ और शेष बचते हैं। शोध के अनुसार किसानों द्वारा आत्महत्याएं और उनकी गरीबी का मुख्य कारण ङ्खञ्जह्र समझौता और ए.ओ.ए. के घोषित मूल्य किसानों को नही मिलना है। शोध में बताया गया है कि वर्ष 2020 तक भारत के वर्तमान 72 करोड़ किसानों में से कृषि में घाटे की वजह से लगभग 41 प्रतिशत किसानों द्वारा खेतीबाड़ी छोड़ दी जाएगी। अब तक 84 लाख किसान खेती छोड़ चुके हंै। पिछले साल कृषि विकास दर मात्र 0.2 प्रतिशत थी जो चिन्ताजनक है।
    देश में बड़े मॉल्स खुल रहे हंै उनमें कम से कम 20 प्रतिशत गांवों में निर्मित व उत्पादित जिन्सों के बिकने की शर्त का प्रावधान किया जाना चाहिए। गांवों में लघु उद्योगों को हर प्रकार से कर मुक्त किया जाए। हरित क्रांति के फैलाव के लिए वर्ष 2011-12 के बजट में मात्र रू. 300 करोड़ का प्रावधान किया है जो ना के बराबर है। ईजराईल के मुकाबले भारत में प्रति एकड़ 33 प्रतिशत उपज होती है इसलिए कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जावे। कामिनी जिन्दल द्वारा शोध में बताया गया है कि भारत के राजस्थान राज्य की स्थिति बढ़ती भूमण्डलीय गर्मी की वजह से अगले सौ सालों तक काफी अच्छी होगी। वैज्ञानिक आधारित कथन के पूर्वानुमान के अनुसार भारत में शताब्दी के अन्त तक देश का तापमान 3 से 5 डिग्री बढ़ जाएगा जिससे गर्मी व सर्दी की मानसून वर्षा में 20 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी होगी।
    शोध में पाया है कि राजस्थान का रेगिस्तान इस सदी के अन्त तक हरा भरा हो जाएगा और भविष्य में वर्षा की मात्रा में बढ़ोत्तरी होगी और राजस्थान में सम्भवत: अकाल नही पडं़ेगे। आज के होलोसीन समय से 4800-6300 वर्ष पहले भारतीय उप महाद्वीप का वह भू-भाग जो वर्तमान में राजस्थान का थार रेगिस्तान है सर्दियों की अधिक वर्षा क्षेत्र होने के कारण यहां बारहमासी झीलें होती थीं। अधिक वर्षा के कारण कृषि उपज बढ़ेगी और लोगों का जीवन स्तर उपर उठेगा। भारत में भी बढ़ती गर्मी के कारण गेहंू तथा चावल का उत्पादन प्रभावित होगा और ग्रीष्मकालीन फसलें अधिक होंगी। गेहूं का उत्पादन मात्र आधा डिग्री सेल्सियस तापमान बढऩे से ही 17 प्रतिशत तक गिर जाएगा। विश्व के दूसरे देशों में कृषि उत्पादन गिरेगा जिसका लाभ भारतीय किसानों को मिलेगा। भारत में कृषि जिन्सों के मूल्य प्रतिवर्ष बढ़ते जाएंगे और भारत में अगले 5 वर्षो में हर कृषि जिन्स के भाव लगभग दो गुणे होने का अनुमान है, जो वर्तमान में विश्व बाजार में चल रहे भावों के बराबर हैं।

    बढ़ती विश्वव्यापी गर्मी की वजह से इण्डोनेशिया तथा मलेशिया में भी जापान की तरह समुद्री तुफानों और सुनामी से बर्बादी होने का अन्देशा है जिससे खाद्य तेलों के भावों में उछाल आएगा। धीरे-धीरे खाद्य तेलों के भाव भी दुगने हो जाएगें। ग्वार का भाव भी वर्तमान स्तर से दोगुणा हो जाएगा और इस जिन्स के वर्तमान भाव ग्वार गम के गुणों और मांग के अनुसार आधे भी नही है। भारत से ग्वार गम का निर्यात वर्तमान स्तर रू. 1500 करोड़ वार्षिक से बढ़कर अगले 5 सालों में मात्रा तथा मूल्यों में बढोतरी होना निश्चित है जिसकी वजह से भारत का निर्यात बढकर रू. 10000 करोड़ से भी अधिक हो जाएगा। ग्वार व अन्य कृषि जिन्सों के मूल्यों में बढ़ोतरी की वजह से गांवो का विकास होगा और ग्रामीणों का शहरों की तरफ पलायन रूकेगा। ग्वार गम के निर्यात मेंं लगातार बढ़ोतरी होगी जिसका लाभ राजस्थान के किसानों तथा विकास डब्ल्यु.एस.पी.लि. कम्पनी को मिलेगा। कम्पनी धीरे-धीरे निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करेगी।

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