ग्रीन बिल्डिंग कांसेप्ट इन इंडिया

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ग्रीन बिल्डिंग कांसेप्ट —
40% बिजली की खपत और 24% कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन के लिए परंपरागत तरीके से निर्मित हो रहीं बिल्डिंग जिम्मेदार हैं। ऐसा मानना है अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का। ऐसे में अपने नाम के अनुरूप ग्रीन बिल्डिंग वह इमारतें हैं जो निर्माण के दौरान न केवल पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि इन भवनों के निर्माण में साधारण भवनों की तुलना में कम पानी लगता है, प्राकृतिक ऊर्जा का ज्यादा उपयोग होता, प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है, कम से कम वेस्ट उत्पन्न होता है और रहने वालों को स्वस्थ वातावरण मिलता है। ग्रीन बिल्डिंग एक साधारण घर के मुकाबले 30 से 40 फीसदी बिजली की बचत करता है। वहीं, 30 से 70 फीसदी तक पानी की बचत करता है। ऐसी इमारतों को बनाने के लिए संसाधन भी कुछ अलग ही होते हैं, जिन्हें ग्रीन मटेरियल कहा जाता है। हालांकि भारत में ऐसी कई इमारतें हैं जो ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट पर बनी तो हैं, लेकिन उन्हें रेटिंग प्राप्त नहीं हुई है। वहीं कई ऐसी भी इमारतें हैं जिन्हें ग्रीन रेटिंग भी मिली हुई है, बावजूद इसके वे ग्रीन बिल्डिंग में शुमार नहीं हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट के सर्वे में यह खुलासा हुआ है।

कौन देता है रेटिंग
फिलहाल भारत में दो रेटिंग सिस्टम हैं, जो किसी भी इमारत को ग्रीन रेटिंग देते हैं। पहला रेटिंग सिस्टम द लीडरशिप इन एनर्जी एंड एन्वायरमेंटल डिजाइन (लीड) कहलाता है, जो इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (आईजीबीसी) द्वारा प्रमोट किया जाता है। आईजीबीसी एक इंडस्ट्री लॉबी ग्रुप है। दूसरा है द ग्रीन रेटिंग फॉर इंटीग्रेटेड हैबिटेट एसेसमेंट (ग्रिहा)। इस सिस्टम को दिल्ली स्थित नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन, द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) व यूनियन मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रीन्यूएबल एनर्जी (एमएनआरई) ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। यह रेटिंग सिस्टम एक किस्म से बेंचमार्क है।

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