मधुरिमा एक निहायत ही समझदार लड़की थी, अपने माता पिता के दिए हुए संस्कारों  में सिमटी हुई, शालीनता और भद्रता की मानो देवी हो. उसके एक रिश्तेदार  का बेटा किसी समारोह में उससे  मिला, जिंदगी की भूल यह थी कि उसे वह अच्छा लगा.

किसी से भी इम्प्रेस न होने वाली लड़की मधुरिमा  उस पर मुग्ध हो गयी.पर उसने तो मधुरिमा के साथ दिल बहलाया और चलता बना. और  मधुरिमा एक इमोशनल फूल बनी उसका इंतज़ार करती रह गयी. खैर वक्त ने उसके ज़ख्म भरे, वो अपने पैरों पर खड़ी हुई पर वक्त की त्रासदी यह कि उसे नौकरी न केवल  उसी   शहर मे मिली जहाँ वह लड़का समीर  रहता था बल्कि उसे मजबूरी में उसके घर भी कुछ दिन रहना पड़ा, समीर तब तक शादी कर के  अपने हैप्पी मैरिड लाइफ का आनंद ले रहा था और सब से बड़ी त्रासदी यह कि उसकी बीवी  स्नेहा उसे बहुत प्यार करती, हर जगह उनके साथ चलने की ज़िद  करती. सबसे बड़ा केहर तब टूट पड़ा जब मधुरिमा को मालूम हुआ कि जहाँ वह नौकरी करती है, वह समीर का कजिन शशांक  है. उसने ऑफिस में अपने बॉस के साथ कोई रिश्तेदारी प्रकट नहीं की,,वह बिना समीर के एहसान के ऑफिस में काम करना चाहती थी, मधुरिमा ने पी जी में रहना शुरू कर दिया.
शशांक सर से वह बहुत प्यार करती थी, सम्मान करती थी. शशांक सर जो कि असल में उसके दूर के कजिन थे, वह स्वाभाविक ही उसे अपने बच्चो जैसा प्यार करते थे, जब वह ऑफिस की  तेज तर्रार डबल  मीनिंग वाली  बातें करने वाली लड़कियों के बीच  घुट जाती तो कहीं एकांत में जाकर रोने लगती. आज सर ऑफिस के काम से कहीं यात्रा पर जा रहे थे, मधुरिमा बहुत ही उदास थी, उसने अपने आप से पूछा कि वह क्यों उदास है, वह सर मेरे सगे भाई तो नहीं  है,मैं उनके लिए क्यों रो रही हूँ, सोचते सोचते थकी हुई वह घर आकर तकिये पर सर रखकर सो गयी, उसे अपने मृतक भाई भोला का सपना आया और मानो उसका चेहरा बदल गया और वह शशांक बन गया, वह उठी उसे मह्सूस हुआ कि उसे शशांक सर में भोला की मूरत दिख रही है.पर ऑफिस में ज़ज़्बाती नहीं हुआ जा सकता,वह अपनी वेदना को जितना दबा रही थी,  उतनी ही घुट रही थी. पर वक्त तो उसका एक के बाद एक टेस्ट लिए जा रहा था, सर के वापस आने तक सब लड़कियों ने मिलकर सर की पत्नी को शशांक और   मधुरिमा के बारे में यथा संभव उलटी बातें पढ़ा दी.  जब जाह्नवी मैडम ने शशांक से पूछा तो उन्होंने कहा, ‘यह अपनी ही बच्ची है, इसे परेशां मत करो’ पर जाह्नवी तो जैसे ज़िद पर आ गयी, ‘अपनी रिश्तेदार है,तो स्पष्ट कहती क्यों नहीं?’ आखिर उसे ऑफिस की पॉलिटिक्स का शिकार  बना कर उसे ऑफिस से बाहर निकाल दिया गया, पर मधुरिमा की बहन संजना ने जाते जाते सर को बता दिया कि वह उनकी ही दूर की कजिन है. पर मधुरिमा का मन और सेहत दोनों ही काफी ख़राब हो गए.
वह लोट कर अपने पुश्तैनी मकान में आकर रहने लगी, जॉब्स के ऑफर आते तो वह नकार देती, क्योंकि बड़े शहरों की दूसरों को बर्बाद कर देने वाली पॉलिटिक्स में दुबारा कदम  नहीं रखना चाहती थी, कभी उसने जॉब ढूंढने की ऊपरी तौर पर  कोशिश की, पर उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,वह सब छोड़ आयी. वह सोचती, कि कभी मैं बूढी हो जाऊंगी, सर भी बूढ़े हो जाएंगे, फिर कभी मैं शायद एक सफल बिज़नेस स्थापित कर चुकी हों तो हम दोनों मिलेंगे,और वह मेरे सिर पर हाथ रखेंगे और कहेंगे कि तुम वापस क्यों नहीं आयी, तब मैं उनसे बहुत लड़ूंगी कि आप दूसरों की बातों में क्यों आ गए. और दूसरी तरफ सोचती किअच्छा हुआ कि मैं ऐसे जगह से लौट आयी नहीं तो सब कहते कि धनवान लोगों को भाई बनाना इसे खूब आता है. अपनी आँखों से अपनी सारी महत्वाकांक्षाओं के बने हुए आंसुओं को उसने पौंछा और अपनी स्टडी रूम की बुक्स को झाड़ कर मिटटी हटाने लगी. कभी उसे लगता कि सर को मुझे रुला कर बहुत मज़ा आता था कभी कभी, अब शायद वो एकांत  में अपने आंसू पोंछते हो कि उसे तो मैंने युहीं जाने को कहा था,वो तो सचमुच चली गयी.
फिर वो सोचती कि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा होगा, उन्होंने मुझसे अपनी जान छुड़ा ली, इतने धनवान लोगों के हाई फाई कल्चर में वो ठहर नहीं सकती थी. उसे सब भूल जाना चाहिए. किताबों की गर्द उसने हटा दी थी, पर मन पर यादों की गर्द अभी भी पहरा दे रही थी. जिसे हटाना उसके वश का नहीं था. लोग कैसे मासूम लोगों का करियर बर्बाद करके आराम से अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाते है. यह सब हथकंडे उसने सीखे नहीं थे, सम्मान करना उसकी रगों में था,चापलूसी नहीं, फिर वह सोचती उसने अच्छा ही किया, जो हुआ ठीक ही हुआ. समीर के उलाहने और उसके रिश्तेदार जिनसे उसने मधुरिमा को हमेशा ही दूर रखने की कोशिश की है उसके रिश्तेदारी के टैग वाले सर मेरे कुछ नहीं लगते, न ही मुझे किसी से जीवन में फिर से मिलना ही है.
उसकी फ़्रस्ट्रेशन कपडे धोने मे निकल रही थी.वक्त ने अभी उसके जख्म भरे नहीं थे, वो उदास  थी,मायूस थी. और इस फ़्रस्ट्रेशन में कपडे बहुत साफ़ धूल गये थे.

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