अनुलोम-विलोम–नाड़ी से जुड़े रोग होंगे दूर

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meditation-YOGA ANULOM-VILOM

बदलती जीवन शैली में वातारण में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। जिससे कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा भी बढ़ रही है। लोग उचित मात्रा में ऑक्सीजन नहीं ग्रहण कर पा रहे हैं। ऐसे में लोग तरह-तरह की सांस की समस्याओं से ग्रसित हो रहे हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में यदि १० से १५ मिनट भस्त्रिका प्राणायाम और १५ से २० मिनट अनुलोम-विलोम किया जाए तो शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मिल सकता है। इससे वात-पित्त और कफ त्रिदोष की समस्या दूर की जा सकती है।

१५ से २० मिनट भस्त्रिका प्राणायाम, अनुलोम-विलोम फेफड़ों को मजबूत बनाएगा। टीबी, कैंसर जैसी बीमारियों से बचाएगा।

भस्त्रिका प्राणायाम अनुलोम-विलोम से बढ़ाएं ऑक्सीजन की मात्रा

भस्त्रिका प्राणायाम की विधि
सुबह किसी साफ और समतल जगह पर आसन बिछा लें। भस्त्रिका प्राणायाम पद्मासन या सुखासन में बैठ कर करें। यह प्राणायाम करते वक्त शरीर को स्थिर अवस्था में रखें। ध्यान रहे सिर, गला, पीठ तथा मेरुदंड सीधे हों। मुंह बंद रखें। दोनों नासिका छिद्रों से एक गति से पूरी सांस अंदर लें। पूरी सांस अंदर लेने के बाद दोनों नासिका छिद्रों से एक गति से पूरी सांस को बाहर निकालें। सांस अंदर लेने और छोड़ने की गति धौंकनी की तरह तीव्र हो और सांस को पूर्ण रूप से अंदर और बाहर लें और बाहर छोडें। जब सांस अंदर खींचे तब फेफड़ों को फैलाएं और जब सांस छोड़ें तब फेफड़ों सिकोड़ें।
लाभ- टीबी,कैंसर, दमा में लाभ और फेफड़े मजबूत होते हैं।
सावधानी- गर्भवती महिलाएं, हर्निया, हृदय, मिर्गी, पथरी, अल्सर, उच्च रक्त चाप के रोगी, सायनस, मस्तिष्क संबंधी समस्या से ग्रसित लोग इसे करें।
अनुलोम-विलोम प्रणायाम में सांस लेने और छोड़ने की विधि को बार-बार दोहराया जाता है। वैसे इस प्राणायाम को नाड़ी शोधक प्रणायाम भी कहा जाता है। इस को करने से नाड़ी से जुड़े बहुत से रोग दूर होते हैं।

अनुलोम-विलोम की विधि

खुली जगह पर मैट या आसन बिछा कर बैठ जाएं। पद्मासन या सुखासन की अवस्था में बैठें। सबसे पहले नाक की बायीं तरफ से सांस भर लें। फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बंद कर लें और दूसरी तरफ से सांस बाहर छोड़ दें। वापस उसी नासिका से सांस वापस भरें और दूसरी तरफ से बाहर निकाल दें। अगर सांस बाएं छिद्र से बाहर निकाल रहे हों तो वापस उसी से सांस भरें। इस क्रिया को लगातार दोहराएं। ठीक इसी प्रकार दूसरे छिद्र पर भी कर सकते हैं। इस क्रिया को पहले ५ मिनट तक करें और बाद में इसका अभ्यास १० मिनट तक करें।
लाभ- अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने से वात-पित्त के विकार दूर होते हैं। फेफड़े मजबूत होते हैं, नाड़ियां शुद्ध होती हैं और शरीर स्वस्थ, शरीर का कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रित रहता है।
नेचुरोपैथी
अनुलोम-विलोम
भस्त्रिका प्राणायाम

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